Voluntry Organigation

Institution of Secondary Distance Education-ISDE

In front of SBI Branch, Timarni-461228 (Madhya Pradesh)
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Certification



Ragging - A Social Crime

From the Desk of Chairman

"An education isn't how much you have committed to memory,
or even how much you know. It's being able to differentiate
between what you know and what you don't."





News & Events


  • साक्षरता
    राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की शुरूआत 1988 में इस इरादे से की गई थी कि 15-35 आयु वर्ग में निरक्षर लोगों को सन् 2007 तक 75 प्रतिशत कामचलाऊ साक्षर बना दिया जाएगा और इस स्तर को कायम रखा जाएगा। यह मिशन स्थानीय स्तर पर सांस्कृतिक और सामाजिक आयोजनों के जरिए लोगों को एकजुट करने और साक्षरता को सामाजिक शिक्षा और जागरूकता के व्यापक कार्यक्रम में शामिल करने के उपायों पर निर्भर था। 2001 की जनगणना से पता चलता है कि देश में साक्षरता का स्तर 1991 में 52.21 प्रतिशत से बढ़कर 65.38 प्रतिशत तक पहुँच गया। पहली बार निरक्षर लोगों की कुल संख्या में गिरावट आई। इस एक दशक के दौरान निरक्षरों की वास्तविक संख्या 32.90 करोड़ से घटकर 30.40 करोड़ रह गई। किन्तु राष्ट्रीय औसत के इस पर्दे के पीछे बहुत अधिक विसंगतियाँ, कुछ क्षेत्रों में निरक्षरता और क्षेत्र, जाति और लिंग आदि जैसे कारणों से मौजूद भिन्नता सिरदर्द बनी हुई है। इतना ही नहीं निरक्षर लोगों की कुल संख्या अब भी बहुत अधिक है और ज्ञानवान समाज के लक्ष्य की तरफ बढ़ता कोई भी देश अपनी इतनी विशाल आबादी को निरक्षर नहीं रहने दे सकता।


  • चिकित्सा शिक्षा
    भारत में न सिर्फ गाँवों और शहरों के बीच बल्कि अलग-अलग राज्यों के बीच भी स्वास्थ्यकर्मियों और स्वास्थ्य सेवाओं के वितरण में बहुत अंतर है। चिकित्सा शिक्षा देने वाले सभी अस्पताल और मेडिकल कॉलेज शहरी इलाकों में हैं, जहाँ सिर्फ 30-35 प्रतिशत आबादी रहती है। स्वास्थ्य परिणाम बताते हैं कि पिछले 60 वर्ष के दौरान चिकित्सा शिक्षा कार्यक्रम इन दोनों स्थितियों को बदलने में नाकामयाब रहे हैं। अत: हमें अपनी स्वास्थ्य व्यवस्था में जबर्दस्त बदलाव की करना होगा ताकि मौजूदा मेडिकल कॉलेजों का स्तर सुधारने के लिए आवश्यक परिवर्तन किए जा सकें और मेडिकल कॉलेजों को चिकित्सा के क्षेत्र में विज्ञान और टैक्नॉलॉजी में हुई जबर्दस्त प्रगति के अनुरूप ढाला जा सके। साथ ही गाँवों में चिकित्सा शिक्षा की कमी की समस्या पर भी ध्यान देना होगा। इसके लिए मौजूदा कॉलेजों में ऐसे अभिनव प्रयास अपनाने होंगे, जिनसे हमारी ज़रूरतों के अनुसार ग्रामीण चिकित्सा शिक्षा कार्यक्रम चलाए जा सकें और ग्रामीण चिकित्सकों को देश के मौजूदा मेडिकल कॉलेजों के भीतर ही प्रशिक्षण दिया जा सके।


  • कृषि
    खेती, भारत की 60 प्रतिशत से अधिक आबादी की आजीविका का मूल साधन है। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में इसके हिस्से में लगातार गिरावट के बावजूद खेती देश में आज भी सबसे बड़ा आर्थिक क्षेत्र है। वृध्दि दरों का नीचा रहना और उनमें लगातार उतार-चढ़ाव के साथ हाल ही में देश के अनेक ग्रामीण इलाकों में खेती से जुड़ा संकट बढ़ना न सिर्फ देश की खाद्य सुरक्षा के लिए खतरनाक है, बल्कि समूचे राष्ट्र की आर्थिक सेहत के लिए भी अच्छा नहीं है। राष्ट्रीय ज्ञान आयोग ने खेतीबाड़ी के काम के दायरे में हस्तक्षेप के अनेक निश्चित क्षेत्रों की पहचान की है। खेती में और खेती से होने वाली आमदनी और पैदावार में स्थाई तौर पर वृध्दि के लिए ज्ञान के उपयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से राष्ट्रीय ज्ञान आयोग ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के साथ मिलकर इस क्षेत्र से जुड़े विविध हितधारकों और विशेषज्ञों के साथ अनेक बैठकों में विचार-विमर्श किया है। इन बैठकों में चार क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया गया। यह क्षेत्र हैं- फसल कटाई के बाद की बुनियादी सुविधाएँ, जैविक खेती, समन्वित कीट नियंत्रण कार्यक्रम और खेती में ऊर्जा का प्रबंध। इन बैठकों में हुई चर्चाओं के आधार पर अनेक सिफारिशें तैयार की गई हैं। राष्ट्रीय ज्ञान आयोग ने कृषि अनुसंधान और विस्तार व्यवस्थाओं पर काम शुरू कर दिया है ताकि उपयोगी सामाजिक और वैज्ञानिक ज्ञान की रचना और प्रसार के लिए आवश्यक तंत्र का दायरा फैलाया और बढ़ाया जा सके।

  • विज्ञान और टैक्नॉलॉजी

    विज्ञान और टैक्नॉलॉजी का विकास लोगों की आर्थिक और सामाजिक उत्थान के लिए आवश्यक है। विज्ञान और टैक्नॉलॉजी के क्षेत्र में नेतृत्व हासिल करना ज्ञान की रचना और उपयोग की प्रक्रिया के अभिन्न अंग हैं। विज्ञान और टैक्नॉलॉजी में प्रगति उद्योगों के लिए नए रास्ते खोल सकती है। यह भारत जैसे विकासशील देशों में ज्ञान आधारित महत्वपूर्ण सेवाएँ प्रदान करने का एक कारगर साधन है। अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में सबसे आगे रहने के लिए यह ज़रूरी है कि भारत विज्ञान और टैक्नॉलॉजी के क्षेत्र में नेतृत्व हासिल करे। देश के भीतर चल रही अनुसंधान गतिविधियों का दायरा और परिमाण बढ़ाने के लिए और प्रयास करने होंगे। अनुसंधान और विकास गतिविधियों में सुधार लाने के लिए विभिन्न उपाय अपनाकर देश में अनुसंधान गतिविधियों का दायरा सुधारने की भी ज़रूरत है।


  • प्रबंधन शिक्षा
    हाल के वर्षों में हमारे देश में व्यावसायिक शिक्षा संस्थानों की बाढ़ सी आ गई है। 1990 के दशक के शुरू से देश में ज्यादातर निजी पूंजी से जितनी बड़ी संख्या में तकनीकी और प्रबंधन शिक्षा संस्थान खुले हैं उतने पहले कभी नहीं खुले। प्रबंधन शिक्षा के क्षेत्र में भारत में 1200 से अधिक संस्थाएँ स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर पर पढ़ाई की सुविधा दे रही हैं। इन संस्थानों से निकलने वाले प्रबंधन स्नातक और स्नातकोत्तर डिग्री- धारी युवक युवतियों को मूल रूप से उद्योगों में काम मिलता है। इसलिए इस बात की ज़रूरत बढ़ती जा रही है कि प्रबंधन शिक्षा का पाठयक्रम और ढाँचा ऐसा हो जो भारत की ज़रूरतों को बेहतर ढंग से पूरा कर सके और देश के भीतर औद्योगिक तथा सेवा क्षेत्र में हो रहे परिवर्तनों के अनुसार ढल सके। इतना ही नहीं यह मूल्याँकन करना भी ज़रूरी है कि विभिन्न संस्थानों में दी जा रही प्रबंधन शिक्षा का स्तर कैसा है, जिससे उन्हें नौकरी देने वाले भर्ती और चयन के समय सही ढंग से फैसला कर सकें।

  • व्यावसायिक शिक्षा

    व्यावसायिक शिक्षा भारत की तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण पहलू कुशल और पढ़ी-लिखी श्रमशक्ति का विकास करना और बूढ़े होते पश्चिमी समाजों की तुलना में युवा राष्ट्र होने का लाभ लेना है। तकनीशियन और अन्य कुशल कारीगर और दस्तकार मैन्युफेक्चरिंग तथा बुनियादी ढाँचागत सुविधाओं के विकास के स्तंभ हैं। कुशल कारीगरों की माँग बढ़ रही है, लेकिन ऑंकड़े बताते हैं कि मौजूदा व्यवस्था यह माँग पूरी नहीं कर पा रही है, क्योंकि जो कौशल सिखाए जा रहे हैं वे बाजार की ज़रूरतों से मेल नहीं रखते। बदलते संदर्भ में इस व्यवस्था को अधिक प्रासंगिक बनाने और जनसंख्या में युवाओं का अनुपात अधिक होने की विशेषता से भविष्य में लाभ उठाने के लिए व्यावसायिक शिक्षा देने का ऐसा मॉडल बनाना ज़रूरी है, जो लचीला, स्थाई, सबको समाहित करने वाला और रचनात्मक हो।


  • कानूनी शिक्षा
    कानून की शिक्षा पेशेवर शिक्षा का एक ऐसा पहलू है, जो न सिर्फ समाज में कानून के ऐतिहासिक उपयोगिता की दृष्टि से, बल्कि भूमंडलीकरण के मौजूदा संदर्भ में भी बहुत महत्वपूर्ण हो गया है। कानून की शिक्षा ज्ञान के सिध्दांतों की रचना करने और उन्हें उन सिध्दांतों को समाज में अपनाने के प्रयासों में एक महत्वपूर्ण कड़ी है। शिक्षा, मुकदमेबाजी, कंपनियों की क्रियाविधियों, सरकार और समाज में प्रशिक्षित कानूनी जानकारों की आवश्यकता पिछले कुछ वर्षों में बहुत अधिक बढ़ गई है और ऐसा अनुमान है कि आने वाले वर्षों में कानून के जानकार प्रशिक्षित व्यक्तियों की माँग बेहिसाब बढ़ेगी। अत: भारत में कानून की शिक्षा के बारे में एक स्पष्ट दीर्घकालिक नीति बनाना बहुत आवश्यक है। इस नीति में लगातार उत्कृष्टता बनाए रखने पर ध्यान देना होगा। राष्ट्रीय ज्ञान आयोग कानून की शिक्षा के मामले में जाने-माने कानूनविदों और शिक्षाविदों के साथ सलाह-मशविरा कर रहा है। उसके कुछ प्रमुख विषयों पर विचार कर रहा है: * कानून की उत्तम शिक्षा सुलभ कराना; * प्रतिभावान शिक्षकों को आकर्षित करना और उन्हें कानूनी शिक्षा संस्थानों में बने रहने के लिए प्रेरित करना; * पाठयक्रम को निरंतर विकसित करने के तरीकों की पहचान करना; * बुनियादी सुविधाओं और प्रशासनिक मसलों के अभिनव समाधान तलाश करना; विनियमन से जुड़े मुद्दे; * दुनिया की स्पर्धा में टक्कर लेने लायक गंभीर शोध परंपरा विकसित करना; कानून का लगातार प्रशिक्षण लेने के ऐसे तौर-तरीके विकसित करना, जो समाज में अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों की ज़रूरतें पूरी कर सके।


  • मुक्त और दूरस्थ शिक्षा
    उच्च शिक्षा पाने के लिए नाम दर्ज कराने वाले विद्यार्थियों में से करीब आधे दूरस्थ माध्यम से यानि मुक्त विश्वविद्यालयों या पारंपरिक विश्वविद्यालयों के पत्राचार पाठयक्रमों के माध्यम से पढ़ रहे हैं। किन्तु दूरस्थ शिक्षा से पढ़ने वाले विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा और उपयुक्त नौकरियों में प्रवेश मिलने की स्थिति को लेकर कुछ सवाल बाकी हैं। मुक्त पाठय सामग्री का इस्तेमाल करने के लिए अभूतपूर्व अवसर मौजूद हैं। मुक्त पाठय सामग्री के प्रसार के लिए आवश्यक ब्रॉडबैंड और इंटरनेट सुविधाओं का बहुत अधिक विकास हुआ है लेकिन इसे अभी और विकसित करना होगा। इतना ही नहीं राष्ट्रीय विशेषज्ञ ऐसी सामग्री का भंडार तैयार कर सकते हैं, जिसे सभी संस्थाओं में इस्तेमाल किया जा सके।
    Timarni